ये क्या सुना, है क्या हो रहा , इंसान भी खुद का न रहा!
ये सोच क्या है और दोष क्या, तू तो अब खुदा का न रहा!
मासूम से फूलो को ये किस सबक का हल मिला,
वो बेकसूर से रह गए, और तू क्यों गुनहगार मिला!
आज फिर सुना, न तेरा धर्म है और न ही तेरी जात है,
कायर है तू इंसान नहीं, तेरी बस यही औकात है!!
देख अपनी किस बुलंदी की चढ़ाई चढ़ रहा,
हर शख्स दुनिया का तुम्हे सोच थू-थू कर रहा,
इंसानियत तो छोड़, हैवानियत-ऐ-हद की भी लात है,
तू ऐ दरिंदगी की नस्ल, तेरी बस यही औकात है!!
तुझे क्या मैं अल्लाह की कहू, और क्या मैं गीता ही पडूँ ,
तू डर से आगे बढ़ चुका , तू दुआओं को बद्दुआ कर चुका,
हर मासूम की कराह में छुपी तेरे लिए बस यही बात है,
तुझे कफ़न भी नसीब न मिले, क्योकि तेरी बस यही औकात है !!
तू बस इतना जान ले, खुदा से हिसाब मांग ले,
आतंकवाद त्याग दे, कहीं वक़्त बेवक़्त लांघ ले,
क्योकि कुछ भी कर, अंत में, लिखी बस तेरी ही मात है,
ऐ बेशरम! तू मर ही जा, तेरी बस यही औकात है !!!