हसरत-ए-आरज़ू

❤ बयाँ करुँ की है तुझसे मुहब्बत,
या फिर अक्स बनके तेरे साथ फिरूं,
मंज़िल न मिले, है ऐसी जुस्तजू,
संग ग़ुम रहें, है हसरत-ए-आरज़ू ❤



❤ आरज़ू है, तुझे कुछ इस कदर पाने की,
कि तू मेरी भी हो और तुझे पता न चले
तेरे इन गुलाबी होंठो से भले ही 'ना' निकले,
तेरा दिल इस कदर हाँ कहे, तुझे पता न चले

 तू आज भी मेरे इश्क़ के साये से बेखबर है,
कब रूह में बस जाऊँ, तुझे पता न चले
मेरे दर्द में मेरे हौसले कि दाद मिली थी तुझसे,
ये तेरा साथ नहीं तो और क्या है, बस तुझे पता न चले ❤



❤ आप तो चले जाएंगे,
हमारी निगाहों के मसले का क्या? ❤



❤ वो तो जज़्बातों का हिसाब-ए-तलब बंद है,
वरना उस कीमत से तेरा मग़रूर ख़रीद लाता ❤



❤ तुझे खोकर ये एहसास हुआ,
की अब एहसास ही खो चुका है ❤



❤ गुम अपनी ग़ुरबत में वो,
गुल बेचने महफ़िल-ए-बाज़ार में जो उतरा,
उसे छज्जे पर देख,
वहीं वो अपनी शाम कर गया
ग़लत हिसाब और चंद फूल मुफ्त,
अपनी दिल उसी के नाम कर गया
चांदनी की चौंक देख
जब ज़हन में घर की याद आयी
घर का रुख कर,
वो बढ़ती दूरी को नाकाम कर गया
हाथ में था कुछ कमाया
और खुद को वो नीलाम कर गया  ❤



❤ जिन्हें हम अक्सर खोजने निकलते हैं,
वो आयने के आगे खड़े मिलते हैं ❤

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