आज फिर यही हुआ
उन कसमों की आगोश में
तेरा चेहरा सा कुछ
आँखें मीचे खड़ा था
मैं आईने के आगे
धुंधला सा गया
तुझसे जो लड़ा था
फिर क्या ही कहता
फिर क्या ही सुनता
खुद को कोसने का
आज मन सा भरा था
सींच आँखों को अपने
सोचा, ज़ख्मो के लिबास को आज हैं सीते
वो दो बरस कुछ यूँ बीते
दिन भी अब रात सा
बेबस और बेपाक सा
काटने को खड़ा था
मैं तुझसे जो लड़ा था
कुछ घंटे सोने, कुछ घंटे रोने,
समय का पहिया अब
मात दे सा गया था
बटोर अपनी बेपनाही
मैं हौसले को समेट
किसी तरह बस आज
नज़रे उठा के चला था
गैरहाज़िर, न किया कोई हंगामा
न मैखाने पर आने दी आंच
कम्बख्त हम शराब जो नहीं पीते
मत पूछ, वो दो बरस कुछ यूँ बीते
फिर ये भी किया कि
खुद को संभालने लगे
दिल को बच्चे की तरह
अब हम पालने लगे
कहते- "कोई नहीं, पर खुद के लिए
तुझे तने रहना है
वो छोड़ ही तो गया है,
आगे बहुत कुछ सहना है"
जो दूर हो निकला है
उस की हौसला अफ़ज़ाई है
खुद को टूटता देख चुप था
दिल, तुझे देख आँख भर आयी है
वो जो साथ मरने की
कस्मे खा रहा था
अब हमें देख ही तो नहीं जीते
वो दो बरस कुछ यूँ बीते
पर वक़्त ने भी
क्या खूब बाज़ी लगायी है
उनसे दूर हमें रखने की
एक नयी सी दुनिया बसाई है
पर जीने का फलसफा
भी क्या खूब हमको आया है
सब पूछते हैं हमसे,
इतना ज्ञान तुमको
कौन सिखलाया है
उन से अपनी आपबीती
भी अब क्या कहें, इसलिए
हम मुस्कुरा निकल
बस अंदर एक कड़वा घूँट है पीते
हाँ, वो दो बरस कुछ यूँ बीते