Monday, 18 November 2019

माँ

बचपन के किस्से मुझे जब भी याद आते हैं,
माँ, तेरे वो पैरो के छाले बहुत रुलाते हैं
सब साथ बैठ खाना जब भी खाते थे
तुझे रोटियों की फ़िक्र थी
और हम फिर भी तुझे सताते थे
मेरी भूक के बढ़ने से तेरी भूक को मिटते देखा है
माँ मैंने तुझे दिन का बचा खाना खाते हुए देखा है

मेरी गम की आँधियों में,
तूने अपने आँचल में छुपाया था,
मेरे घर से बाहर निकलते ही,
तेरा जी हर बार घबराया था
मुझे सर्दी से बचाती,
माँ, मैंने तुझे बुखार में तपते देखा है
मेरी गलती के लिए तुझको
ज़माने से लड़ते हुए देखा है

मुझे याद है मैंने पापा की जेब से,
जब भी पैसे चुराए थे,
पकडे जाने पर हमेशा
तुमने खुद पर इलज़ाम लगाए थे
अकेले मैं बुला कर तुमने
मुझे हमेशा खरी खोटी सुनाई थी,
पापा की चप्पल से बचा के
खुद को ढाल बनायीं थी
मेरे मेहेंगे कपड़ो की ज़िद पर तुझको,
खुद की ख्वाहिशो को दफनाते देखा है,
हाँ माँ, मैंने तुझे तेरे दुःख में,
मेरे लिए मुस्कुराते हुए देखा है

जन्मदिन मुबारक हो माँ 💓💓💓

Thursday, 21 February 2019

कुछ यूँ बीते


आज फिर यही हुआ
उन कसमों की आगोश में
तेरा चेहरा सा कुछ
आँखें मीचे खड़ा था
मैं आईने के आगे
धुंधला सा गया
तुझसे जो लड़ा था
फिर क्या ही कहता
फिर क्या ही सुनता
खुद को कोसने का
आज मन सा भरा था
सींच आँखों को अपने
सोचा, ज़ख्मो के लिबास को आज हैं सीते
वो दो बरस कुछ यूँ बीते 

दिन भी अब रात सा
बेबस और बेपाक सा 
काटने को खड़ा था
मैं तुझसे जो लड़ा था 
कुछ घंटे सोने, कुछ घंटे रोने,
समय का पहिया अब
मात दे सा गया था 
बटोर अपनी बेपनाही 
मैं हौसले को समेट
किसी तरह बस आज 
नज़रे उठा के चला था 
गैरहाज़िर, न किया कोई हंगामा
न मैखाने पर आने दी आंच 
कम्बख्त हम शराब जो नहीं पीते 
मत पूछ, वो दो बरस कुछ यूँ बीते 

फिर ये भी किया कि 
खुद को संभालने लगे
दिल को बच्चे की तरह 
अब हम पालने लगे 
कहते- "कोई नहीं, पर खुद के लिए 
तुझे तने रहना है
वो छोड़ ही तो गया है,
आगे बहुत कुछ सहना है" 
जो दूर हो निकला है 
उस की हौसला अफ़ज़ाई है
खुद को टूटता देख चुप था
दिल, तुझे देख आँख भर आयी है 
वो जो साथ मरने की
कस्मे खा रहा था
अब हमें देख ही तो नहीं जीते
वो दो बरस कुछ यूँ बीते 

पर वक़्त ने भी
क्या खूब बाज़ी लगायी है
उनसे दूर हमें रखने की
एक नयी सी दुनिया बसाई है 
पर जीने का फलसफा
भी क्या खूब हमको आया है
सब पूछते हैं हमसे,
इतना ज्ञान तुमको
कौन सिखलाया है
उन से अपनी आपबीती 
भी अब क्या कहें, इसलिए
हम मुस्कुरा निकल 
बस अंदर एक कड़वा घूँट है पीते
हाँ,  वो दो बरस कुछ यूँ बीते

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