Saturday, 20 January 2018

मैं आसिफा


ऐ ज़मीन तेरे दामन में कहीं छुप जाऊँ मैं,

रात बाकी तो है, पर चाँद पर दाग लग चुका।
ये हवा अपनी रुख बदल बेवफा बना गयी खुद को,
वाकिफ हो ये मगर मुझे तारों का साथ मिल चुका।
गलत हो, अगर ये समझ लो के हम अकेले हैं,
तेरी रूह आज भी साथ है ये पता चल चुका।
मेरे दर्द में मेरे हौंसलो की दाद मिली थी मुझको,
ये तेरा साथ नहीं तो और क्या है, ये दिल कह चुका।


वीरानियों की आबाद चुभन ने चैन छीन लिया है मेरा,

चुप रह कर भी माहौल अब और चुप रह न सका। 
तेरे इंतज़ार की इन्तेहाँ में रात और भी काली हुई,
लगा ये कालिक के लिबास में निशाचर मुझे निगल चुका। 

आँखें नम है मेरी, जूनून थमा सा लगता है।

दर्द की कराह और चीख से क्षण ये खरा सा लगता है।
उन दरिंदो की वहशियत ने इस कदर मरोड़ा मुझे,
इन बारिश के आँसुओ में ख़ुदा भी आज रोया सा लगता है।

रूह छीन ले गए वो निर्जीव शरीर से,

अपनी भूख मिटा गए वो पावन ज़मीर से,
नोच गए वो मेरे अंग को, मेरी ज़िन्दगी की जंग को,
बेख़ौफ़ घूमते हैं, 
न शर्म हो। 
न मर्म  हो।

मैं मर तो गयी, मुरझा भी गयी,

लेकिन हर दिल में एक ज्वाला सुलगा भी गयी।
इन्साफ के तराजू तो अंधे है न मगर,
तभी तो मुझे मरने में थोड़ी और आसानी हुई।

तू कायर है, तू द्वेष है,

तू राक्षश भी, तू क्लेश है,
तू क्रूर भी, तू कठोर भी,
तू कलंकित और अत्याचार है।
तू मानव जाति पर दाग है,
तू मर्द नहीं बेकार है।

जिसे स्त्री का सम्मान हो,
जिसे नारी रक्षा का ध्यान हो,
सिर्फ वही  मर्द की शान हो।

सिर्फ वही मर्द की शान हो।

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