उनकी वफ़ा ने कुछ यूँ रोशन किया
मेरे आशियाने को,
हुस्न-ए-मुहब्बत ने फ़रमाया- “काश दो दिये इस दिल में भी जलाए होते।”
हम ग़ुरूर से बोले- “दिल में झाँक के देखिए, आग का जलज़ला उठा है।”
वो इठलाए- “हुनर-ए-इश्क़ रोशनी से होती है, जलने से नहीं।”
उनकी इस अदा के क़ातिल,
हम भी कुछ कम ना थे।
दर्द-ए-मुहब्बत बयान करते करते,
हमें अपनी नसों से प्यार ना रहा।
और बहते हुए ख़ूँ से हमने,
हिम्मत-ए-इज़हार कर दिया।
उनकी निगाहो ने हमें,
इशकीय शबाब का एक बूँद ना दिया।
शबाब-ए-महफ़िल से कुछ यूँ ग़ायब हुए जनाब,
जिस क़दर पानी से ख़फ़ा आग है होती।
और हमारे कमबख़्त आँसुओ की फुहार बोली,
मुहब्बत सिर्फ़ तब तक दिलचस्प होती है, जब तक ख़ुद को नहीं होती। ❤️
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